हाइकु कविताएँ
बादल लेटे
पर्वतों के शीश पे
दुलारे बेटे।
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कोयल कूकी
आम्र वृक्ष बौराया
बसन्त आया।
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कैसी सुहानी
समुद्र की लहरें
प्रेम- दीवानी।
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रोते हैं ताल
बेघर मछलियाँ
पड़ा अकाल।
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मन को साधो
दुश्चिन्ताओं का कभी
बोझ न लादो।
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पसरी धूप
भीगती बारिश से
दृश्य अनूप।
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कुछ न लेते
लाखों हाथों से सूर्य
आशीष देते।
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नींद न आये
उमस भरे दिन
आग लगायें।
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पर्वत न्यारा
कन्दराओं से गिरे
सहस्त्रधारा।
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ठहरो मन
न तो सोओ, न भागो
जहाँ हो जागो।
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फूस से बना
डाल पर मकान
खग-विज्ञान।
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खेलने आते
बादलों के समूह
घर ढहाते।
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हरा कालीन
मखमली दूब पे
धूप आसन।
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हाड़ न मांस
साहस से चढ़ती
चींटी आकास।
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आज की पीढ़ी
आसमान में चाहे
लगाना सीढ़ी।
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कुंठा संत्रास
कुछ न कुछ है ही
सभी के पास।
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पढ़ते पंक्षी
सांस के पेड़ पर
जीवन-स्वर।
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बसंती राग
सुनाकर कोयल
तोड़े बैराग।
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भिगोये मेघ
प्रेम-पिचकारी से
धरा की देह।
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महात्मा वट
कुटी-बाहर खड़े
बिखेरे लट।
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घूँघट खोला
चन्द्रमा का मेघ ने
मन टटोला।
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-राजेन्द्र बहादुर सिंह 'राजन'

3 Comments:
bahut achche haiku hain aapke.prakrati ka manvikaran man ko lubhata hai.
sweta sarswat, jaipur
आपके हाइकु बहुत अच्छे हैं विशेष रूप से जो प्रकृति का मानवीकरण वाले। हाइकु कानन नेट पर एक बहुत अच्छा प्रयोग है।
सन्तोष व्यास
www.saralchetana.blogspot.com
आपके कई हाइकु बहुत अच्छे लगे।
-भास्कर तैलंग, होशंगाबाद
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