Saturday, July 16, 2005

हाइकु कविताएँ

कोटि पगों से
झूमकर नाचती
बरखा रानी।

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देते आशीष
अनगिन हाथों से
सूर्य देवता।

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झाँकता इन्दु
पूनम की रात में
अथाह सिन्धु।

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बुझता कहाँ
असत्य की आँधी से
सत्य का दीप।

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उमड़ी घटा
जेठ के माह में भी
सावनी छटा।

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पीली चूनर
हवा में लहराये
सरसों गाये।

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उम्र गँवाये
जीवन-रहस्य को
जान न पाये।

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बाहों में घेरे
खूबसूरत चाँद
घना कुहासा।

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कंचन काया
फगुनहटी रंग
मन को भाया।

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जग का मेला
छोड़ के उड़ चला
हंस अकेला।

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आस्था के दिये
जलते गगन में
धरा के लिये।

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-राजेन्द्र बहादुर सिंह 'राजन'

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