Saturday, July 16, 2005

परिचय

Rajendra bahadur singh Rajan
10 जून 1954 को फत्तेपुर, रायबरेली(उ॰प्र॰) में जन्में राजेन्द्र बहादुर सिंह राजन हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में सृजनरत हैं। आई॰आई॰टी॰ लि॰ रायबरेली में सहायक अभियन्ता श्री राजन की रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर की अनेक पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही हैं। लगभग एक दर्जन संकलनों में भी आपकी रचनाओं को सम्मलित किया गया है। अनेक संस्थाओं द्वारा आपको पुरस्कृत व सम्मानित किया जा चुका है।
हाइकु दर्पण में आपकी हाइकु कविताओं का प्रकाशन होता रहता है।
इण्टरनेट पर प्रकाशित आपकी रचनाएँ-
'अनुभूति' पर गीत
प्रकाशित पुस्तकें–
* भर्तृहरि (खण्डकाव्य)
* हिमालय की पुकार (काव्य-कृति)
* चन्दन विष (उपन्यास)
* बादल के अलबेले रंग (बाल साहित्य)
* कदम्ब (हाइकु संग्रह)
* प्रायश्चित (उपन्यास)
* कविता की तलाश (काव्य संग्रह)
सम्प्रति- आई॰आई॰टी॰, रायबरेली (उ॰प्र॰) सहायक अभियन्ता पद पर कार्यरत।
सम्पर्क सूत्र-
ग्राम फत्तेपुर, पोस्ट–बेनी कामा
जिला-रायबरेली (उ॰प्र॰)
पिन-229402
मोबा॰ - 9838598360

हाइकु कविताएँ

कोटि पगों से
झूमकर नाचती
बरखा रानी।

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देते आशीष
अनगिन हाथों से
सूर्य देवता।

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झाँकता इन्दु
पूनम की रात में
अथाह सिन्धु।

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बुझता कहाँ
असत्य की आँधी से
सत्य का दीप।

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उमड़ी घटा
जेठ के माह में भी
सावनी छटा।

***

पीली चूनर
हवा में लहराये
सरसों गाये।

***

उम्र गँवाये
जीवन-रहस्य को
जान न पाये।

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बाहों में घेरे
खूबसूरत चाँद
घना कुहासा।

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कंचन काया
फगुनहटी रंग
मन को भाया।

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जग का मेला
छोड़ के उड़ चला
हंस अकेला।

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आस्था के दिये
जलते गगन में
धरा के लिये।

***


-राजेन्द्र बहादुर सिंह 'राजन'

हाइकु कविताएँ

बादल लेटे
पर्वतों के शीश पे
दुलारे बेटे।

***


कोयल कूकी
आम्र वृक्ष बौराया
बसन्त आया।

***


कैसी सुहानी
समुद्र की लहरें
प्रेम- दीवानी।

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रोते हैं ताल
बेघर मछलियाँ
पड़ा अकाल।

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मन को साधो
दुश्चिन्ताओं का कभी
बोझ न लादो।

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पसरी धूप
भीगती बारिश से
दृश्य अनूप।

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कुछ न लेते
लाखों हाथों से सूर्य
आशीष देते।

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नींद न आये
उमस भरे दिन
आग लगायें।

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पर्वत न्यारा
कन्दराओं से गिरे
सहस्त्रधारा।

***


ठहरो मन
न तो सोओ, न भागो
जहाँ हो जागो।

***


फूस से बना
डाल पर मकान
खग-विज्ञान।

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खेलने आते
बादलों के समूह
घर ढहाते।

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हरा कालीन
मखमली दूब पे
धूप आसन।

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हाड़ न मांस
साहस से चढ़ती
चींटी आकास।

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आज की पीढ़ी
आसमान में चाहे
लगाना सीढ़ी।

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कुंठा संत्रास
कुछ न कुछ है ही
सभी के पास।

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पढ़ते पंक्षी
सांस के पेड़ पर
जीवन-स्वर।

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बसंती राग
सुनाकर कोयल
तोड़े बैराग।

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भिगोये मेघ
प्रेम-पिचकारी से
धरा की देह।

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महात्मा वट
कुटी-बाहर खड़े
बिखेरे लट।

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घूँघट खोला
चन्द्रमा का मेघ ने
मन टटोला।
***

-राजेन्द्र बहादुर सिंह 'राजन'

प्रतिक्रिया

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